Thursday, November 22, 2018

'ये तालिबान अफ़ग़ानिस्तान को दूसरा वज़ीरिस्तान बना देगा'

अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान की मौजूदगी को दो दशक से अधिक समय गुज़र गया है. लेकिन, बहुत से लोग अभी भी उसकी पहचान, उसके एजेंडे, उसके नज़रिये से बेख़बर हैं.

ऐसा लगता है कि तालिबान ने बड़ी चालाकी से लोगों को अपनी पहचान के बारे गुमराह कर रखा है.

तालिबान के तौर-तरीकों और बर्ताव के बारे में कई ऐसी बातें हैं जिन पर एतबार करना मुश्किल लगता है.

हाल ही में तालिबान ने खुद को मानवाधिकार, महिला अधिकार और व्यापक बुनियादी अधिकारों जैसे आधुनिक मूल्यों पर आधारित सरकार के लिए प्रतिबद्ध माना है.

मॉस्को अधिवेशन के बाद जारी अपने घोषणापत्र में भी तालिबान ने कहा है कि वो पवित्र इस्लाम धर्म पर आधारित महिला अधिकारों पर यक़ीन रखता है और इसी तरह अफ़ग़ानिस्तान में एक आज़ाद हुकूमत बनाने की ख्वाहिश रखता है.

तालिबान का चरमपंथ
तालिबान का लक्ष्य अपने लोगों को यक़ीन दिलाना है कि वो सत्तर के दशक वाली अपनी नीति और व्यवहार में बदलाव लाकर एक उदारवादी संगठन बन गया है.

इसके अलावा तालिबान का एक और मक़सद है, खुद को 'इस्लामिक स्टेट' और 'तहरीक-ए-तालिबान-ए-पाकिस्तान' जैसे संगठनों से अलग साबित करना.

इन दिनों बहुत से लोग ये मानने लगे हैं कि तालिबान एक राजनीतिक संगठन है और 'अल-क़ायदा' और 'इस्लामिक स्टेट' जैसे अन्य कट्टरपंथी संगठनों से जुदा है.

ऐसे लोगों की दलील है कि तालिबान का चरमपंथ राजनीतिक वजहों और घटनाओं से प्रेरित एक 'सियासी चरमपंथ' है.

क्योंकि तालिबान को अमरीका ने सत्ता से हटाया, उसके सदस्यों को बंदी बनाया और सज़ा दिलाई, इसीलिए तालिबान का चरमपंथ असल में अमरीका के ख़िलाफ़ और अफ़ग़ानिस्तान की आज़ादी के पक्ष में है.

ऐसे लोगों के मुताबिक़ इस मसले का हल ये है कि अमरीका तालिबान के साथ सुलह करे और अफ़ग़ानिस्तान में सक्रिय एक राजनीतिक संगठन के तौर पर उसे मान्यता दे.

समझौते की अमरीकी कोशिश
पिछले कुछ सालों में तालिबान ने भी खुद को एक सियासी संगठन के तौर पर स्थापित करने की कोशिश की है.

तालिबान के बारे में ऐसी धारणा रखने वाले लोग असल में उसके दूसरे पहलुओं जैसे उसकी विचारधारा, उसकी चरमपंथी गतिविधियों और उसके अपराधों को अनदेखा कर रहे हैं.

ऐसी ही धारणाओं का नतीजा था कि पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल में उनके सलाहकार डॉक्टर बार्नेट आर रुबिन ने तालिबान के साथ समझौते की कोशिश की. इससे एक साल पहले अमरीकी डिप्लोमैट रॉबिन रफ़ैल ने तालिबान के साथ शुरुआती संपर्क स्थापित किया था.

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