विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुमानों के मुताबिक़ 2016 में ख़ुदकुशी से 7,93,000 मौतें हुईं. इनमें से ज़्यादातर पुरुष थे.
उसी साल ब्रिटेन में पुरुष ख़ुदकुशी दर 1981 से लेकर अब तक सबसे कम रही- प्रति एक लाख आबादी पर 15.5 मौतें. फिर भी पुरुषों में 45 साल की उम्र से पहले तक मौत का सबसे बड़ा कारण है- ख़ुदकुशी.
ब्रिटेन की महिलाओं में ख़ुदकुशी से होने वाली मौत की दर पुरुषों की दर के एक-तिहाई है. प्रति लाख आबादी पर 4.9 मौतें.
ऑस्ट्रेलिया में महिलाओं के मुक़ाबले पुरुषों के ख़ुदकुशी से मरने की आशंका तीन गुनी ज़्यादा है. अमरीका में यह 3.5 गुनी है, रूस और अर्जेंटीना में 4 गुनी.
विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक़ क़रीब 40 फ़ीसदी देशों में पुरुषों के ख़ुदकुशी करने की दर प्रति एक लाख आबादी पर 15 से ज़्यादा है. केवल 1.5 फ़ीसदी देशों में महिलाओं के ख़ुदकुशी करने की दर पुरुषों से अधिक है.
मनोवैज्ञानिक और अमरीकन फ़ाउंडेशन फ़ॉर सुसाइड प्रिवेंशन में रिसर्च की वाइस-प्रेसिडेंट जिल हार्केवी-फ्रीडमन कहती हैं, "जब से हम आंकड़े जमा कर रहे हैं, तब से हमने यह असमानता देखी है."
अमरीका का यह स्वास्थ्य संगठन ख़ुदकुशी से प्रभावित होने वाले लोगों की मदद करता है.
ख़ुदकुशी एक संवेदनशील और जटिल मुद्दा है, जिसके कई कारण हो सकते हैं. मौत के बाद ख़ुदकुशी के पीछे की असल वजह के बारे में पता लगाना भी मुमकिन नहीं है.
जैसे-जैसे मानसिक सेहत को लेकर जागरूकता बढ़ी है, इसके संभावित कारणों के बारे में लोगों की समझ बढ़ी है. लेकिन लैंगिक भेद का सवाल आज भी क़ायम है.
यह सवाल तब और जटिल हो जाता है जब हम देखते हैं कि महिलाओं में अवसाद की दर पुरुषों से ज़्यादा है.
ख़ुदकुशी की कोशिश करने के मामले में महिलाएं पुरुषों से आगे हैं. उदाहरण के लिए, अमरीका में वयस्क महिलाओं ने पुरुषों से 1.2 गुना ज़्यादा बार ख़ुदकुशी की कोशिश की.
ख़ुदकुशी करने के पुरुषों के तरीक़े ज़्यादा उग्र होते हैं. कोई बचाने की कोशिश करे, उससे पहले ही जान चले जाने का ख़तरा ज़्यादा होता है.
ख़ुदकुशी के साधनों तक पहुंच होना भी एक बड़ा कारक है. उदाहरण के लिए, अमरीका में हर 10 में से 6 बंदूक़ों के मालिक पुरुष हैं. वहां आधी से ज़्यादा आत्महत्याएं गोली मारकर होती हैं.
पुरुष इन तरीक़ों को इसलिए चुनते हैं क्योंकि वे अपने काम को पूरा करने का अधिक पक्का इरादा रखते हैं.
ख़ुद को नुक़सान पहुंचाने की कोशिश में जख़्मी होकर अस्पताल पहुंचे 4,000 से ज़्यादा लोगों के अध्ययन से पता चला कि पुरुषों में महिलाओं के मुक़ाबले ख़ुदकुशी की इच्छा ज़्यादा प्रबल थी.
यह कहना बहुत आसान है कि महिलाएं अपनी समस्याएं साझा करने को तैयार रहती हैं, जबकि पुरुष उनको छिपाए रखते हैं.
बहुत से समुदायों में पुरुषों को यह सिखाया जाता है कि तुम मज़बूत हो और यह कभी मत मानो कि तुम मुश्किल में हो.
ऑस्ट्रेलिया में 24 घंटे संकट सहायता और ख़ुदकुशी रोकने की सेवा देने वाली चैरिटी 'लाइफ़लाइन" के पूर्व कार्यकारी निदेशक कोलमैन ओ'ड्रिसोल कहते हैं, "हम बच्चों को बताते हैं कि लड़के रोते नहीं."
"हम छोटी उम्र से ही लड़कों को समझा देते हैं कि भावनाएं ज़ाहिर नहीं करनी, क्योंकि ऐसा कमज़ोर लोग करते हैं."
कनाडा में सेंटर फ़ॉर सुसाइड प्रिवेंशन की कार्यकारी निदेशक मारा ग्रुनौ कहती हैं, "मां बेटों की तुलना में बेटियों से ज़्यादा बातें करती हैं. वे अपनी भावनाएं साझा करती हैं और एक-दूसरे की भावनाओं को अच्छे से समझती हैं."
"हम महिलाओं से भावुक होने की उम्मीद करते हैं."
पुरुषों में यह स्वीकार करने की संभावना कम हो सकती है कि वे असुरक्षित महसूस करते हैं. डॉक्टर के पास जाने पर भी वे महिलाओं की तुलना में कम बोलते हैं.
ब्रिटेन के एक मेडिकल जर्नल के अध्ययन में पाया गया कि सामान्य प्राथमिक चिकित्सा परामर्श लेने में पुरुष महिलाओं से 32 फीसदी पीछे हैं.
हार्केवी-फ्रीडमन कहती हैं, "मानसिक सेहत के लिए पुरुष कम मदद मांगते हैं. ऐसा नहीं है कि पुरुषों में ऐसी समस्याएं नहीं होतीं, लेकिन वे यह जान नहीं पाते कि उनका तनाव उन्हें ख़ुदकुशी के जोख़िम में डाल रहा है."
यदि किसी व्यक्ति को यह पता नहीं है कि उनकी मानसिक स्थिति ख़ुद उनके लिए संकट का कारण बन सकती है तो उन्हें यह भी पता नहीं होगा कि उनकी मदद के लिए कुछ किया भी जा सकता है.
हार्केवी-फ्ऱीडमन का कहना है कि ख़ुदकुशी करने वालों में से केवल एक-तिहाई लोगों को ही उस समय मनोचिकित्सा मिल रही होती है.
कुछ लोग डॉक्टरी मदद लेने की जगह ख़ुद से भी अपना इलाज करने की ग़लती करते हैं.
हार्केवी-फ्रीडमन कहती हैं, "पुरुषों में मादक पदार्थों और शराब के सेवन की प्रवृत्ति अधिक होती है, जो उनके संकट को प्रतिबिंबित करती है. यह ख़ुदकुशी की संभावना को भी बढ़ाती है."
महिलाओं की तुलना में पुरुषों की शराब पर निर्भरता दोगुनी हो सकती है. शराब का सेवन अवसाद और आवेगी व्यवहार को बढ़ा सकता है. इसमें ख़ुदकुशी का भी जोख़िम है.
अन्य जोख़िम कारक परिवार या काम से जुड़े हो सकते हैं. उदाहरण के लिए, आर्थिक मंदी में बेरोज़गारी बढ़ती है और ख़ुदकुशी की दर बढ़ने का भी ख़तरा रहता है. अक्सर मंदी के 18-24 महीने बाद ऐसा होता है.
2015 के एक अध्ययन से पता चला था कि बेरोज़गारी दर 1 फीसदी बढ़ने से ख़ुदकुशी दर में 0.79 फीसदी की बढ़ोतरी होती है.
पैसे की चिंता हो या नौकरी ढूंढ़ने का संकट हो तो किसी की भी मानसिक सेहत बिगड़ सकती है. इसके साथ सामाजिक दबाव और पहचान के संकट के तत्व भी हैं.
पुरुषों की ख़ुदकुशी रोकने के प्रति समर्पित ब्रिटिश चैरिटी "कैंपेन अगेंस्ट लिविंग मिजरेब्ली" (Calm) के सीईओ सिमॉन गनिंग कहते हैं, "हम अपने साथियों के मुक़ाबले ख़ुद को आंकने और आर्थिक रूप से सफल होने में अपना पूरा जीवन लगा देते हैं."
Tuesday, March 26, 2019
Wednesday, March 20, 2019
ये हैं भारत के पहले लोकपाल जस्टिस पीसी घोष
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस पीसी घोष देश के पहले लोकपाल बन गए हैं. राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से उनकी नियुक्ति की अधिसूचना जारी की गई.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी की चयन समिति ने उनके नाम की सिफ़ारिश की थी.
समिति के सदस्य और लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस बैठक में भाग नहीं लिया था.
आईए जानते हैं कि कौन हैं देश के पहले लोकपाल बने जस्टिस पीसी घोष
1952 में जन्मे जस्टिस पिनाकी चंद्र घोष (पीसी घोष) जस्टिस शंभू चंद्र घोष के बेटे हैं. उन्होंने अपनी क़ानून संबंधी पढ़ाई कोलकाता से ही की. साल 1997 में वे कलकत्ता हाईकोर्ट में जज बने.
दिसंबर 2012 में वह आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने. इस पद पर रहते हुए उन्होंने एआईएडीएमके की पूर्व सचिव ससिकला को भ्रष्टाचार के एक मामले में सज़ा सुनाई.
इसके बाद 27 मई 2017 को वह सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश पद से रिटायर हुए. जस्टिस घोष ने अपने सुप्रीम कोर्ट कार्यकाल के दौरान कई अहम फ़ैसले दिये.
सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने के बाद जस्टिस घोष राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से जुड़ गए थे.
सुप्रीम कोर्ट के जज रहते हुए जस्टिस राधाकृष्णन की बेंच में उन्होंने फ़ैसला सुनाया था कि जल्लीकट्टू और बैलगाड़ी दौड़ की प्रथाएं पशु क्रूरता निवारण अधिनियम का उल्लंघन हैं.
जस्टिस आरएफ़ नरीमन के साथ, उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में शामिल बीजेपी नेताओं लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, कल्याण सिंह और अन्य के ख़िलाफ़ आपराधिक साज़िश के आरोप तय करने के लिए ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिये थे.
लोकपाल बेंच में एक अध्यक्ष के अलावा सात और सदस्य होंगे, जिनमें से 50 प्रतिशत न्यायिक सदस्य और 50 प्रतिशत एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक और महिलाओं से होने चाहिए.
इसके साथ ही श्री जस्टिस दिलीप बी. भोसले, जस्टिस प्रदीप कुमार मोहंती, जस्टिस अभिलाषा कुमारी और जस्टिस अजय कुमार त्रिपाठी को न्यायिक सदस्य बनाया गया है.
2013 में पारित हुआ क़ानून
भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए लंबे समय से लोकपाल की मांग की जा रही थी. समाजसेवी अन्ना हज़ारे ने भी अनशन करके लोकपाल क़ानून के लिए आंदोलन किया था.
लोकपाल क़ानून 2013 में दोनों सदनों में पारित किया गया था जो कुछ श्रेणियों के लोकसेवकों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार की जांच के लिए केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्तों की नियुक्ति का प्रावधान करता है.
इसके बाद से लोकपाल के चयन की प्रक्रिया चल रही थी. लेकिन लोकपाल की नियुक्ति में देरी और मल्लिकार्जुन खड़गे की बैठक में अनुपस्थिति को लेकर विवाद बना हुआ था.
चयन समिति की बैठक में विपक्ष के नेता की मौजूदगी न होने के कारण पीसी घोष की नियुक्ति पर सवाल खड़ा हो सकता है.
लोकपाल के अध्यक्ष के तौर पर नियुक्त होने वाले शख़्स को सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश होना चाहिए या देश के किसी उच्च न्यायालय का वर्तमान और पूर्व मुख्य न्यायाधीश होना चाहिए.
ग़ैर-न्यायिक सदस्य होने की स्थिति में नियुक्ति के लिए भ्रष्टाचार रोधी, प्रशासन, सतर्कता, क़ानून एंव प्रबंधन संबंधित क्षेत्र का 25 सालों का अनुभव होना चाहिए.
यह पात्रता लोकपाल अधिनियम, 2013 के मुताबिक़ निर्धारित की गई है. अध्यक्ष पद पर कोई निर्वाचित प्रतिनिधि या कोई कारोबारी या पंचायत व नगर निगम के सदस्य की नियुक्ति नहीं हो सकती.
इसके अलावा उम्मीदवार किसी ट्रस्ट या लाभ के पद पर भी नहीं होना चाहिए. अध्यक्ष का कार्यकाल पांच वर्ष का होगा और वेतन भारत के मुख्य न्यायाधीश के समान होगा.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन, पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी की चयन समिति ने उनके नाम की सिफ़ारिश की थी.
समिति के सदस्य और लोकसभा में कांग्रेस के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने इस बैठक में भाग नहीं लिया था.
आईए जानते हैं कि कौन हैं देश के पहले लोकपाल बने जस्टिस पीसी घोष
1952 में जन्मे जस्टिस पिनाकी चंद्र घोष (पीसी घोष) जस्टिस शंभू चंद्र घोष के बेटे हैं. उन्होंने अपनी क़ानून संबंधी पढ़ाई कोलकाता से ही की. साल 1997 में वे कलकत्ता हाईकोर्ट में जज बने.
दिसंबर 2012 में वह आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने. इस पद पर रहते हुए उन्होंने एआईएडीएमके की पूर्व सचिव ससिकला को भ्रष्टाचार के एक मामले में सज़ा सुनाई.
इसके बाद 27 मई 2017 को वह सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश पद से रिटायर हुए. जस्टिस घोष ने अपने सुप्रीम कोर्ट कार्यकाल के दौरान कई अहम फ़ैसले दिये.
सुप्रीम कोर्ट से रिटायर होने के बाद जस्टिस घोष राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से जुड़ गए थे.
सुप्रीम कोर्ट के जज रहते हुए जस्टिस राधाकृष्णन की बेंच में उन्होंने फ़ैसला सुनाया था कि जल्लीकट्टू और बैलगाड़ी दौड़ की प्रथाएं पशु क्रूरता निवारण अधिनियम का उल्लंघन हैं.
जस्टिस आरएफ़ नरीमन के साथ, उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में शामिल बीजेपी नेताओं लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, कल्याण सिंह और अन्य के ख़िलाफ़ आपराधिक साज़िश के आरोप तय करने के लिए ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिये थे.
लोकपाल बेंच में एक अध्यक्ष के अलावा सात और सदस्य होंगे, जिनमें से 50 प्रतिशत न्यायिक सदस्य और 50 प्रतिशत एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक और महिलाओं से होने चाहिए.
इसके साथ ही श्री जस्टिस दिलीप बी. भोसले, जस्टिस प्रदीप कुमार मोहंती, जस्टिस अभिलाषा कुमारी और जस्टिस अजय कुमार त्रिपाठी को न्यायिक सदस्य बनाया गया है.
2013 में पारित हुआ क़ानून
भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिए लंबे समय से लोकपाल की मांग की जा रही थी. समाजसेवी अन्ना हज़ारे ने भी अनशन करके लोकपाल क़ानून के लिए आंदोलन किया था.
लोकपाल क़ानून 2013 में दोनों सदनों में पारित किया गया था जो कुछ श्रेणियों के लोकसेवकों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार की जांच के लिए केंद्र में लोकपाल और राज्यों में लोकायुक्तों की नियुक्ति का प्रावधान करता है.
इसके बाद से लोकपाल के चयन की प्रक्रिया चल रही थी. लेकिन लोकपाल की नियुक्ति में देरी और मल्लिकार्जुन खड़गे की बैठक में अनुपस्थिति को लेकर विवाद बना हुआ था.
चयन समिति की बैठक में विपक्ष के नेता की मौजूदगी न होने के कारण पीसी घोष की नियुक्ति पर सवाल खड़ा हो सकता है.
लोकपाल के अध्यक्ष के तौर पर नियुक्त होने वाले शख़्स को सुप्रीम कोर्ट का वर्तमान या पूर्व न्यायाधीश होना चाहिए या देश के किसी उच्च न्यायालय का वर्तमान और पूर्व मुख्य न्यायाधीश होना चाहिए.
ग़ैर-न्यायिक सदस्य होने की स्थिति में नियुक्ति के लिए भ्रष्टाचार रोधी, प्रशासन, सतर्कता, क़ानून एंव प्रबंधन संबंधित क्षेत्र का 25 सालों का अनुभव होना चाहिए.
यह पात्रता लोकपाल अधिनियम, 2013 के मुताबिक़ निर्धारित की गई है. अध्यक्ष पद पर कोई निर्वाचित प्रतिनिधि या कोई कारोबारी या पंचायत व नगर निगम के सदस्य की नियुक्ति नहीं हो सकती.
इसके अलावा उम्मीदवार किसी ट्रस्ट या लाभ के पद पर भी नहीं होना चाहिए. अध्यक्ष का कार्यकाल पांच वर्ष का होगा और वेतन भारत के मुख्य न्यायाधीश के समान होगा.
Friday, March 8, 2019
5 सेकंड में नीरव मोदी का 100 करोड़ का बंगला ध्वस्त, देखें VIDEO
आखिरकार कई महीनों से चर्चित फरार हीरा कारोबारी नीरव मोदी का अलीबाग वाला बंगला ढहा दिया गया. शुक्रवार दोपहर में 100 करोड़ का समंदर किनारे का बंगला 100 विस्फोटकों की मदद से जमींदोज कर दिया गया. इससे पहले मंगलवार को बंगले को ढहाने का काम शुरू हुआ था. सबसे पहले बंगले के शीशों को तोड़कर मलबे में तब्दील किया गया और आज 30 हजार वर्गफीट में बने बंगले को भी ढहा दिया गया.
नीरव मोदी का देशभर में चर्चित अलीबाग वाला बंगला महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में स्थित है. सी-बीच के पास बने करीब 100 करोड़ रुपये के इस बंगले को तोड़ने का दूसरा चरण मंगलवार को शुरू हो गया था. अब तक उन ढांचों को गिराया गया है जिनमें शीशे लगे थे. बंगले में लगे शीशों को इसलिए हटाया गया क्योंकि विस्फोट के बाद यदि शीशे उड़कर पास के बंगलों में गिरे तो इससे बड़ा नुकसान हो सकता था.
नीरव मोदी करीब 13,700 करोड़ रुपए के पीएनबी घोटाले का मुख्य आरोपी है. घोटाला उजागर होने के बाद नीरव मोदी के कई ठिकानों पर छापे पड़े और उसकी संपत्ति सीज की गई थी. कई बेडरूम और हॉल वाले इस बंगले में फर्स्ट फ्लोर पर 1000 वर्ग फीट का स्वीमिंग पूल भी है. मोदी ने इस बंगले के बाहर अवैध तरीके से एक गार्डन भी बनवाया था.
महाराष्ट्र सरकार द्वारा नीरव मोदी के इस बंगले को गिराने का आदेश 4 दिसंबर को ही जारी कर दिया गया था. आदेश पर अमल करते हुए बंगले को तोड़ने का पहला चरण 25 जनवरी को शुरू हुआ था. तब कई दीवारें तोड़ी गई थीं लेकिन 27 जनवरी को काम रोक दिया गया था. नीरव मोदी को अलीबाग क्षेत्र में 376 वर्ग मीटर के प्लॉट पर बंगला बनाने की परमिशन मिली थी, लेकिन उसने 1081 वर्ग मीटर जगह का घेराव किया. अब सरकार द्वारा इस अवैध निर्माण को ढहाया जा रहा है.
नीरव मोदी के इस बंगले को जनवरी में गिराने का काम इसलिए रोका गया क्योंकि प्रशासन घर के भीतर से कीमती सामानों को सही से निकालना चाहता था ताकि बंगले की संपत्ति से अधिक से अधिक रकम की भरपाई की जा सके. इससे पहले नीरव मोदी की 147.72 करोड़ रुपए की संपत्ति प्रवर्तन निदेशालय ने अटैच की थी.
नीरव मोदी 13,700 करोड़ रुपए के पीएनबी घोटाले का आरोपी है. नीरव ने विशेष अदालत को जवाब भेजकर कहा था कि वह सुरक्षा कारणों से भारत नहीं आ सकता. नीरव फिलहाल ब्रिटेन में रह रहा है.
काशी विद्वत परिषद के संगठन महामंत्री दीपक मालवीय का कहना है कि बाबा विश्वनाथ का देश के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में विशेष महत्व है. वो पूरे विश्व के नाथ हैं. पूरे देश के लोग मुक्ति की प्राप्ति के लिए काशी आते हैं. तो इन्हें कौन मुक्त करेगा जो खुद लोगों को मुक्ति देते हैं, काशी मोक्ष का कारक है. बाबा विश्वनाथ के इर्द गिर्द सुंदरीकरण किया जा सकता है, सुविधाएं बढ़ाई जा सकती हैं लेकिन बाबा को मुक्त करने की बात कहना अनुचित है.
दीपक मालवीय ने कहा कि काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण के लिए जिन मंदिरों और देव विग्रहों को तोड़ा गया उसे जमींदोज कर उसके ऊपर निर्माण करना अनुचित प्रक्रिया है. क्योंकि इन सभी देव विग्रहों की प्राण प्रतिष्ठा हुई थी. अगर सरकार सुंदरीकरण कर रही है तो इन्हें पुन: प्राण प्रतिष्ठित कराते हुए दर्शन पूजन की उचित व्यवस्था करे.
काशी विश्वनाथ कॉरिडोर की जद में आने वाले क्षेत्र को बनारस में पक्का महाल कहा जाता है. यह क्षेत्र गंगा तट पर अस्सी से राजघाट तक फैला है. बनारस का यह इलाका खुद में कई संस्कृतियों को समेटे हुए है. अलग-अलग राज्यों के रियासतों की प्राचीन इमारत व वहां पूजे जाने वाले पौराणिक मंदिर और देव विग्रह इसी क्षेत्र में स्थित हैं. जिनके दर्शन करने पूरे देश से लोग आते हैं. पक्का महाल में बंगाली, नेपाली, गुजराती, दक्षिण भारतीय समुदायों के अपने अपने मोहल्ले हैं और इनसे जुड़े देवी देवताओं के मंदिर हैं.
नीरव मोदी का देशभर में चर्चित अलीबाग वाला बंगला महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में स्थित है. सी-बीच के पास बने करीब 100 करोड़ रुपये के इस बंगले को तोड़ने का दूसरा चरण मंगलवार को शुरू हो गया था. अब तक उन ढांचों को गिराया गया है जिनमें शीशे लगे थे. बंगले में लगे शीशों को इसलिए हटाया गया क्योंकि विस्फोट के बाद यदि शीशे उड़कर पास के बंगलों में गिरे तो इससे बड़ा नुकसान हो सकता था.
नीरव मोदी करीब 13,700 करोड़ रुपए के पीएनबी घोटाले का मुख्य आरोपी है. घोटाला उजागर होने के बाद नीरव मोदी के कई ठिकानों पर छापे पड़े और उसकी संपत्ति सीज की गई थी. कई बेडरूम और हॉल वाले इस बंगले में फर्स्ट फ्लोर पर 1000 वर्ग फीट का स्वीमिंग पूल भी है. मोदी ने इस बंगले के बाहर अवैध तरीके से एक गार्डन भी बनवाया था.
महाराष्ट्र सरकार द्वारा नीरव मोदी के इस बंगले को गिराने का आदेश 4 दिसंबर को ही जारी कर दिया गया था. आदेश पर अमल करते हुए बंगले को तोड़ने का पहला चरण 25 जनवरी को शुरू हुआ था. तब कई दीवारें तोड़ी गई थीं लेकिन 27 जनवरी को काम रोक दिया गया था. नीरव मोदी को अलीबाग क्षेत्र में 376 वर्ग मीटर के प्लॉट पर बंगला बनाने की परमिशन मिली थी, लेकिन उसने 1081 वर्ग मीटर जगह का घेराव किया. अब सरकार द्वारा इस अवैध निर्माण को ढहाया जा रहा है.
नीरव मोदी के इस बंगले को जनवरी में गिराने का काम इसलिए रोका गया क्योंकि प्रशासन घर के भीतर से कीमती सामानों को सही से निकालना चाहता था ताकि बंगले की संपत्ति से अधिक से अधिक रकम की भरपाई की जा सके. इससे पहले नीरव मोदी की 147.72 करोड़ रुपए की संपत्ति प्रवर्तन निदेशालय ने अटैच की थी.
नीरव मोदी 13,700 करोड़ रुपए के पीएनबी घोटाले का आरोपी है. नीरव ने विशेष अदालत को जवाब भेजकर कहा था कि वह सुरक्षा कारणों से भारत नहीं आ सकता. नीरव फिलहाल ब्रिटेन में रह रहा है.
काशी विद्वत परिषद के संगठन महामंत्री दीपक मालवीय का कहना है कि बाबा विश्वनाथ का देश के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में विशेष महत्व है. वो पूरे विश्व के नाथ हैं. पूरे देश के लोग मुक्ति की प्राप्ति के लिए काशी आते हैं. तो इन्हें कौन मुक्त करेगा जो खुद लोगों को मुक्ति देते हैं, काशी मोक्ष का कारक है. बाबा विश्वनाथ के इर्द गिर्द सुंदरीकरण किया जा सकता है, सुविधाएं बढ़ाई जा सकती हैं लेकिन बाबा को मुक्त करने की बात कहना अनुचित है.
दीपक मालवीय ने कहा कि काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के निर्माण के लिए जिन मंदिरों और देव विग्रहों को तोड़ा गया उसे जमींदोज कर उसके ऊपर निर्माण करना अनुचित प्रक्रिया है. क्योंकि इन सभी देव विग्रहों की प्राण प्रतिष्ठा हुई थी. अगर सरकार सुंदरीकरण कर रही है तो इन्हें पुन: प्राण प्रतिष्ठित कराते हुए दर्शन पूजन की उचित व्यवस्था करे.
काशी विश्वनाथ कॉरिडोर की जद में आने वाले क्षेत्र को बनारस में पक्का महाल कहा जाता है. यह क्षेत्र गंगा तट पर अस्सी से राजघाट तक फैला है. बनारस का यह इलाका खुद में कई संस्कृतियों को समेटे हुए है. अलग-अलग राज्यों के रियासतों की प्राचीन इमारत व वहां पूजे जाने वाले पौराणिक मंदिर और देव विग्रह इसी क्षेत्र में स्थित हैं. जिनके दर्शन करने पूरे देश से लोग आते हैं. पक्का महाल में बंगाली, नेपाली, गुजराती, दक्षिण भारतीय समुदायों के अपने अपने मोहल्ले हैं और इनसे जुड़े देवी देवताओं के मंदिर हैं.
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