Tuesday, March 26, 2019

ख़ुदकुशी से मरने वालों में पुरुष ज़्यादा क्यों हैं

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुमानों के मुताबिक़ 2016 में ख़ुदकुशी से 7,93,000 मौतें हुईं. इनमें से ज़्यादातर पुरुष थे.

उसी साल ब्रिटेन में पुरुष ख़ुदकुशी दर 1981 से लेकर अब तक सबसे कम रही- प्रति एक लाख आबादी पर 15.5 मौतें. फिर भी पुरुषों में 45 साल की उम्र से पहले तक मौत का सबसे बड़ा कारण है- ख़ुदकुशी.

ब्रिटेन की महिलाओं में ख़ुदकुशी से होने वाली मौत की दर पुरुषों की दर के एक-तिहाई है. प्रति लाख आबादी पर 4.9 मौतें.

ऑस्ट्रेलिया में महिलाओं के मुक़ाबले पुरुषों के ख़ुदकुशी से मरने की आशंका तीन गुनी ज़्यादा है. अमरीका में यह 3.5 गुनी है, रूस और अर्जेंटीना में 4 गुनी.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक़ क़रीब 40 फ़ीसदी देशों में पुरुषों के ख़ुदकुशी करने की दर प्रति एक लाख आबादी पर 15 से ज़्यादा है. केवल 1.5 फ़ीसदी देशों में महिलाओं के ख़ुदकुशी करने की दर पुरुषों से अधिक है.

मनोवैज्ञानिक और अमरीकन फ़ाउंडेशन फ़ॉर सुसाइड प्रिवेंशन में रिसर्च की वाइस-प्रेसिडेंट जिल हार्केवी-फ्रीडमन कहती हैं, "जब से हम आंकड़े जमा कर रहे हैं, तब से हमने यह असमानता देखी है."

अमरीका का यह स्वास्थ्य संगठन ख़ुदकुशी से प्रभावित होने वाले लोगों की मदद करता है.

ख़ुदकुशी एक संवेदनशील और जटिल मुद्दा है, जिसके कई कारण हो सकते हैं. मौत के बाद ख़ुदकुशी के पीछे की असल वजह के बारे में पता लगाना भी मुमकिन नहीं है.

जैसे-जैसे मानसिक सेहत को लेकर जागरूकता बढ़ी है, इसके संभावित कारणों के बारे में लोगों की समझ बढ़ी है. लेकिन लैंगिक भेद का सवाल आज भी क़ायम है.

यह सवाल तब और जटिल हो जाता है जब हम देखते हैं कि महिलाओं में अवसाद की दर पुरुषों से ज़्यादा है.

ख़ुदकुशी की कोशिश करने के मामले में महिलाएं पुरुषों से आगे हैं. उदाहरण के लिए, अमरीका में वयस्क महिलाओं ने पुरुषों से 1.2 गुना ज़्यादा बार ख़ुदकुशी की कोशिश की.

ख़ुदकुशी करने के पुरुषों के तरीक़े ज़्यादा उग्र होते हैं. कोई बचाने की कोशिश करे, उससे पहले ही जान चले जाने का ख़तरा ज़्यादा होता है.

ख़ुदकुशी के साधनों तक पहुंच होना भी एक बड़ा कारक है. उदाहरण के लिए, अमरीका में हर 10 में से 6 बंदूक़ों के मालिक पुरुष हैं. वहां आधी से ज़्यादा आत्महत्याएं गोली मारकर होती हैं.

पुरुष इन तरीक़ों को इसलिए चुनते हैं क्योंकि वे अपने काम को पूरा करने का अधिक पक्का इरादा रखते हैं.

ख़ुद को नुक़सान पहुंचाने की कोशिश में जख़्मी होकर अस्पताल पहुंचे 4,000 से ज़्यादा लोगों के अध्ययन से पता चला कि पुरुषों में महिलाओं के मुक़ाबले ख़ुदकुशी की इच्छा ज़्यादा प्रबल थी.

यह कहना बहुत आसान है कि महिलाएं अपनी समस्याएं साझा करने को तैयार रहती हैं, जबकि पुरुष उनको छिपाए रखते हैं.

बहुत से समुदायों में पुरुषों को यह सिखाया जाता है कि तुम मज़बूत हो और यह कभी मत मानो कि तुम मुश्किल में हो.

ऑस्ट्रेलिया में 24 घंटे संकट सहायता और ख़ुदकुशी रोकने की सेवा देने वाली चैरिटी 'लाइफ़लाइन" के पूर्व कार्यकारी निदेशक कोलमैन ओ'ड्रिसोल कहते हैं, "हम बच्चों को बताते हैं कि लड़के रोते नहीं."

"हम छोटी उम्र से ही लड़कों को समझा देते हैं कि भावनाएं ज़ाहिर नहीं करनी, क्योंकि ऐसा कमज़ोर लोग करते हैं."

कनाडा में सेंटर फ़ॉर सुसाइड प्रिवेंशन की कार्यकारी निदेशक मारा ग्रुनौ कहती हैं, "मां बेटों की तुलना में बेटियों से ज़्यादा बातें करती हैं. वे अपनी भावनाएं साझा करती हैं और एक-दूसरे की भावनाओं को अच्छे से समझती हैं."

"हम महिलाओं से भावुक होने की उम्मीद करते हैं."

पुरुषों में यह स्वीकार करने की संभावना कम हो सकती है कि वे असुरक्षित महसूस करते हैं. डॉक्टर के पास जाने पर भी वे महिलाओं की तुलना में कम बोलते हैं.

ब्रिटेन के एक मेडिकल जर्नल के अध्ययन में पाया गया कि सामान्य प्राथमिक चिकित्सा परामर्श लेने में पुरुष महिलाओं से 32 फीसदी पीछे हैं.

हार्केवी-फ्रीडमन कहती हैं, "मानसिक सेहत के लिए पुरुष कम मदद मांगते हैं. ऐसा नहीं है कि पुरुषों में ऐसी समस्याएं नहीं होतीं, लेकिन वे यह जान नहीं पाते कि उनका तनाव उन्हें ख़ुदकुशी के जोख़िम में डाल रहा है."

यदि किसी व्यक्ति को यह पता नहीं है कि उनकी मानसिक स्थिति ख़ुद उनके लिए संकट का कारण बन सकती है तो उन्हें यह भी पता नहीं होगा कि उनकी मदद के लिए कुछ किया भी जा सकता है.

हार्केवी-फ्ऱीडमन का कहना है कि ख़ुदकुशी करने वालों में से केवल एक-तिहाई लोगों को ही उस समय मनोचिकित्सा मिल रही होती है.

कुछ लोग डॉक्टरी मदद लेने की जगह ख़ुद से भी अपना इलाज करने की ग़लती करते हैं.

हार्केवी-फ्रीडमन कहती हैं, "पुरुषों में मादक पदार्थों और शराब के सेवन की प्रवृत्ति अधिक होती है, जो उनके संकट को प्रतिबिंबित करती है. यह ख़ुदकुशी की संभावना को भी बढ़ाती है."

महिलाओं की तुलना में पुरुषों की शराब पर निर्भरता दोगुनी हो सकती है. शराब का सेवन अवसाद और आवेगी व्यवहार को बढ़ा सकता है. इसमें ख़ुदकुशी का भी जोख़िम है.

अन्य जोख़िम कारक परिवार या काम से जुड़े हो सकते हैं. उदाहरण के लिए, आर्थिक मंदी में बेरोज़गारी बढ़ती है और ख़ुदकुशी की दर बढ़ने का भी ख़तरा रहता है. अक्सर मंदी के 18-24 महीने बाद ऐसा होता है.

2015 के एक अध्ययन से पता चला था कि बेरोज़गारी दर 1 फीसदी बढ़ने से ख़ुदकुशी दर में 0.79 फीसदी की बढ़ोतरी होती है.

पैसे की चिंता हो या नौकरी ढूंढ़ने का संकट हो तो किसी की भी मानसिक सेहत बिगड़ सकती है. इसके साथ सामाजिक दबाव और पहचान के संकट के तत्व भी हैं.

पुरुषों की ख़ुदकुशी रोकने के प्रति समर्पित ब्रिटिश चैरिटी "कैंपेन अगेंस्ट लिविंग मिजरेब्ली" (Calm) के सीईओ सिमॉन गनिंग कहते हैं, "हम अपने साथियों के मुक़ाबले ख़ुद को आंकने और आर्थिक रूप से सफल होने में अपना पूरा जीवन लगा देते हैं."

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