Tuesday, April 23, 2019

अमजद अली ख़ान ने जब प्रिंसेज़ डायना को ठंड से बचाया

ग्वालियर में संगीत के 'सेनिया बंगश' घराने की छठी पीढ़ी में जन्म लेने वाले अमजद अली ख़ान को संगीत विरासत में मिला.

महज़ 12 साल की उम्र में उन्होंने एकल सरोद-वादन का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया था. एक छोटे से बालक की सरोद पर अनूठी लयकारी सुन कर दिग्गज संगीतज्ञ दंग रह गए.

बीबीसी की इंदु पांडेय से ख़ास बातचीत में सरोद वादक अमजद अली ख़ान ने अपनी ज़िंदगी के बड़े ही दिलचस्प किस्से सुनाए.

अमजद अली ख़ान ने अपने पिता से ही सरोद वादन में परंपरागत तरीके से तकनीकी दक्षता हासिल की और अब एक बार फिर वो अपने दोनों बेटों अमान अली बंगश और अयान अली बंगश के साथ लंदन के रॉयल फेस्टिवल हॉल में प्रोग्राम करेंगे.

अपने बीते वक़्त के बारे में याद करते हुए अमजद अली ख़ान ने बताया, '' जिन दिनों भारत के प्राइम मिनिस्टर पी. वी. नरसिम्हा राव थे, उन दिनों प्रिंसेज़ डायना और प्रिंस चार्ल्स आये थे. प्रधानमंत्री ने मुझे भी डिनर के लिए बुलाया. मुझे पता नहीं था कि बहुत ही ख़ास लोगो को बुलाया गया है, मैं एक पुराना बुज़ुर्गों वाला शॉल लेके निकल गया.

पहुँचने पर मुझे अंदाज़ा हुआ कि डिनर सिर्फ़ 20 लोगों के लिए था, डॉ मनमोहन सिंह उस वक़्त फाइनेंस मिनिस्टर थे. डिनर ओपन एरिया में था और काफी ठंड हो गयी थी. अचानक वहां बैठे लोग इधर उधर देखने लगे, मैंने पूछा कि क्या खोज रहे हैं सब? पता लगा कि डायना को ठंड लग रही थी, पहले तो मैं हिचकिचाया कि मैं अपना पुराना शॉल दूँ या नहीं? पर मुझसे उनकी तकलीफ नहीं देखी गयी तो मैंने अपना शॉल उन्हें पहना दिया. डायना ने मुझे थैंक यू कहा और पुरे वक़्त उन्होंने उसे ओढ़े रखा''.

लंदन में आयोजित होने वाले लाइव शो के बारे में अमजद अली ख़ान ने बताया कि रॉयल फेस्टिवल हॉल में परफॉर्म करना हर किसी का सपना होता है और वो बेहद खुशनसीब हैं.

अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अभी भी ईरान से तेल ख़रीद रहे देशों के लिए प्रतिबंधों से रियायतें ख़त्म करने का फ़ैसला लिया है.

व्हाइट हाउस का कहना है कि चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और तुर्की को दी गई छूट मई में समाप्त हो जाएगी.

इसके बाद इन देशों पर भी अमरीका के प्रतिबंध लागू हो जाएंगे.

अमरीका ने ये फ़ैसला ईरान के तेल निर्यात को शून्य पर लाने के उद्देश्य से किया है.

इसका मक़सद ईरान की सरकार के आय के मुख्य स्रोत को समाप्त करना है.

ईरान का कहना है कि प्रतिबंध अवैध हैं और उसके लिए छूट के कोई मायने नहीं है.

क्यों आई यह नौबत
बीते साल ट्रंप ने ईरान और छह पश्चिमी देशों के बीच हुए ऐतिहासिक परमाणु समझौते से अमरीका को अलग कर लिया था.

इसके बाद उन्होंने ईरान पर फिर से आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे ताकि उसे नए समझौते के लिए विवश किया जा सके.

अंतरराष्ट्रीय शक्तियों के साथ हुए परमाणु समझौते के तहत आर्थिक प्रतिबंधों से छूट के बदले ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों को जांच की अनुमति देने के लिए तैयार हुआ था.

ओबामा के शासनकाल में हुए इस समझौते को ट्रंप ने अमरीका के लिए घाटे का सौदा बताया था.

ट्रंप प्रशासन को उम्मीद है कि वो ईरान सरकार को नया समझौता करने के लिए मजबूर कर लेंगे और इसके दायरे में सिर्फ़ ईरान का परमाणु कार्यक्रम ही नहीं बल्कि बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम भी होगा.

अमरीका का ये भी कहना है कि इससे मध्य पूर्व में ईरान का "अशिष्ट व्यवहार" भी नियंत्रित होगा.

अमरीकी प्रतिबंधों का ईरान की अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर हुआ है. ईरान की मुद्रा इस समय रिकॉर्ड निचले स्तर पर है.

सालाना महंगई दर चार गुणा तक बढ़ गई है, विदेशी निवेशक जा रहे हैं और परेशान लोगों ने सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन तक किए हैं.

Wednesday, April 17, 2019

लोकसभा चुनाव 2019: पीएम मोदी की जाति सवर्ण से बनी थी ओबीसी?

कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के 'चौकीदार चोर है' और 'सभी चोरों का सरनेम मोदी है' जैसे बयानों को लेकर मोदी ने कहा, "पिछड़ा होने की वजह से, हम पिछड़ों को अनेक बार ऐसी परेशानियां झेलनी पड़ी हैं. अनेक बार कांग्रेस और उसके साथियों ने मेरी हैसियत बताने वाली, मेरी जाति बताने वाली बातें कही हैं."

मोदी ने कहा, "कांग्रेस के नामदार ने पहले चौकीदारों को चोर कहा, जब ये चला नहीं तो अब कह रहे हैं कि जिसका भी नाम मोदी है वो सारे चोर क्यों हैं?"

2014 में जब पहली बार नरेंद्र मोदी ने ख़ुद को पिछड़ा वर्ग का बताया था तो इस पर ख़ासा विवाद हुआ था.

तब कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि मोदी ने सत्ता में आने के बाद अपनी जाति को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) में शामिल करा दिया था.

हालाँकि गुजरात सरकार ने सफ़ाई में कहा था कि घांची समाज को 1994 से गुजरात में ओबीसी का दर्जा मिला हुआ है. नरेंद्र मोदी इसी घांची जाति के हैं.

गुजरात कांग्रेस के नेता शक्ति सिंह गोहिल ने मोदी पर आरोप लगाया था कि वह पिछड़ी जाति के नही हैं.

गोहिल के अनुसार, मोदी 2001 में मुख्यमंत्री बने और राजनीतिक लाभ लेने के लिए 2002 में अपनी जाति को पिछड़ी जाति में डाल दिया.

गोहिल ने गुजरात सरकार के 2002 के एक सर्कुलर का हवाला देते हुए आरोप लगाया था कि मोदी ने मुख्यमंत्री बनने के बाद अपनी जाति को ओबीसी श्रेणी में शामिल कराने के लिए जोड़तोड़ की थी.

उस समय गोहिल ने बीबीसी को बताया था कि उन्होंने यह पता लगाने के लिए एक आरटीआई याचिका दायर की थी कि घांची जाति को राज्य की ओबीसी सूची में कब लाया गया था.

गोहिल के अनुसार, "मोदी गुजरात राज्य के अमीर और समृद्ध मोढ घांची जाति से हैं. इस बिरादरी को मोदी के मुख्यमंत्री बनने से पहले ओबीसी सूची में कभी शामिल नहीं किया गया था."

गोहिल के मुताबिक, "मोदी ने गुजरात सरकार की व्यवस्था को अपने फ़ायदे के लिए बदला है. मोढ घांची समाज को ओबीसी सूची में डालने की कभी कोई मांग नही थीं पर ख़ुद को पिछड़ी जाति का बताकर वोट बैंक की पॉलिटिक्स कर सकें इसलिए उन्होने ख़ुद को पिछड़ा बना दिया."

बीबीसी हिंदी के पास एक जनवरी, 2002 को गुजरात सरकार की ओर से जारी किया गया वह पत्र है जिसमें मोढ घांची को ओबीसी सूची में शामिल करने की घोषणा की गई थी.

कांग्रेस के आरोप के जवाब में गुजरात सरकार ने दो दशक पुरानी एक अधिसूचना का ज़िक्र किया जो कहती है कि मोढ घांची (तेली) जाति को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल किया गया है.

राज्य सरकार के प्रवक्ता नितिन पटेल के मुताबिक, "गुजरात सरकार के समाज कल्याण विभाग ने 25 जुलाई 1994 को एक अधिसूचना जारी की थी जो 36 जातियों को ओबीसी श्रेणी में शामिल करती थी और इसमें संख्या 25 (ब) में मोढ घांची जाति का ज़िक्र है, इस जाति को ओबीसी में शामिल किया गया है."

कौन हैं मोढ घांची?
घांची जिन्हें अन्य राज्यों में साहू या तेली के नाम से जाना जाता है. ये पुश्तैनी तौर पर खाद्य तेल का व्यापार करने वाले लोग हैं. गुजरात में हिंदू और मुस्लिम दो धर्मों को मानने वाले घांची हैं.

इनमें से उत्तर पूर्वी गुजरात में मोढेरा से ताल्लुक रखने वालों को मोढ घांची कहा जाता है. गुजरात के गोधरा हत्याकांड में पकड़े गए ज़्यादातर लोग घांची मुसलमान थे.

जाने-माने सामाज विज्ञानी अच्युत याग्निक का कहना है कि 'यह कहना ग़लत होगा कि मोदी एक फ़र्ज़ी ओबीसी हैं.'

उन्होंने कहा, "कांग्रेस का आरोप इसलिए ग़लत है क्योंकि घांची हमेशा से ही ओबीसी सूची में आते हैं. मोदी जिस जाति से हैं वह घांची की ही एक उपजाति है. इसलिए वह ओबीसी सूची में कहलाएँगे."

घनश्याम शाह ने कहा, "गुजरात में घांची समाज राज्य के सभी हिस्सों में फैला हुआ है. इसका एक हिस्सा मोढेरा सूर्य मंदिर के आस-पास के इलाकों में है जिसे मोढ घांची कहते हैं."

पर सवाल यह है कि अगर मोदी की जाति ओबीसी सूची में आती थी तो फिर सरकार ने 2002 में यह परिपत्र क्यों जारी किया?

अपना नाम दिए जाने से इनकार करते हुए गुजरात सरकार के एक सीनियर अधिकारी ने बीबीसी हिंदी को बताया था, "समस्या यह थी कि जब घांची समाज को ओबीसी सूची में डाला तब उसकी सभी उपजाति को भी उसमें शामिल कर देना चाहिए था. पर ऐसा नही हुआ. इसलिए गुजारत सरकार ने एक नया परिपत्र जारी करके मोढ घांची का उसमें शामिल कर लिया."

हलांकि जब उनसे यह पूछा गया कि क्या यह मोदी के कहने से हुआ तो उन्होने इस बारे में 'जानकारी नहीं है' कहकर बात समाप्त कर दी.

Wednesday, April 10, 2019

मोदी को फिर पीएम क्यों देखना चाहते हैं इमरान ख़ान

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने बीबीसी से कहा कि कश्मीर के विवादित इलाक़े को लेकर भारत के साथ शांति, इस पूरे इलाक़े के लिए 'बहुत महत्वपूर्ण' बात होगी.

क्रिकेटर से राजनीतिज्ञ बने इमरान ख़ान आठ महीने पहले प्रधानमंत्री बने हैं. उन्होंने कहा कि परमाणु शक्ति सम्पन्न पड़ोसी आपसी मतभेदों को केवल बातचीत से ही हल कर सकते हैं.

इमरान ख़ान का ये बयान ऐसे समय आया है जब भारत प्रशासित कश्मीर में हिंसा की घटना के कुछ हफ़्ते बाद ही भारत में आम चुनाव होने जा रहे हैं.

पुलवामा में भारतीय सुरक्षा बलों पर एक आत्मघाती हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के बालाकोट में एक कथित चरमपंथी कैंप पर हवाई हमला किया था.

ये पूछने पर कि भारत के प्रधानमंत्री और उनके देश को वो क्या संदेश देना चाहते हैं, इमरान ख़ान ने बीबीसी के जॉन सिम्पसन से कहा कि "कश्मीर मुद्दे को हल करना होगा और इस मुद्दे को लंबे समय तक ज्वलंत नहीं बनाए रखा जा सकता."

उन्होंने कहा, "दोनों सरकारों का पहला काम है कि हम ग़रीबी को कैसे कम करने जा रहे हैं और ग़रीबी को कम करने का रास्ता है कि हम आपसी मतभेदों को वार्ता के ज़रिए हल करें और एक ही मतभेद है, वो है कश्मीर."

भारत के प्रधानमंत्री ने अपने चुनाव प्रचार अभियान में पाकिस्तान विरोधी बयानबाज़ियों का सहारा लिया और राष्ट्रीय सुरक्षा पर ज़ोर दिया है.

कई लोगों को लगता है कि यह चुनाव, हिंदू राष्ट्रवादी बीजेपी की ध्रुवीकरण की राजनीति पर जनमत-संग्रह जैसा है.

इमरान ख़ान दोनों पड़ोसी देशों के बीच तनाव के ख़तरों को लेकर भी बोले. उन्होंने कहा, "एक बार जवाबी कार्रवाई करते हैं तो कोई नहीं कह सकता कि ये आगे कहां तक जाएगा."

उन्होंने कहा कि अगर भारत फिर से आता है और पाकिस्तान पर हमला बोलता है तो पाकिस्तान के पास जवाबी कार्रवाई करने के सिवाय कोई चारा नहीं बचता.

"उस स्थिति में जब दोनों देशों परमाणु शक्ति सम्पन्न हैं, मुझे लगा था कि ये बिल्कुल ग़ैरज़िम्मेदाराना रवैया था."

चुनाव के मौके पर दोस्ती का हाथ
बीबीसी वर्ड अफ़ेयर्स एडिटर जॉन सिम्पसन के अनुसार, आठ महीने के अपने कार्यकाल में इमरान ख़ान ने बहुत कम साक्षात्कार दिए हैं. इसलिए जब उन्होंने बीबीसी और ब्रिटिश और अमरीकी समाचार संस्थानों के एक छोटे से समूह को मिलने के लिए बुलाया तो उनका मक़सद था भारत को आम चुनावों के पहले एक संदेश देना.

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था अपने बुरे दौर में है. भारत के साथ तनावपूर्ण रिश्ते और पाकिस्तान पर अपने इलाक़े में चरमपंथी इस्लामी ग्रुपों को खुली छूट देने के आरोपों के कारण विदेशी निवेशक दूर हो गए हैं.

हालांकि इमरान ख़ान ज़ोर देकर इन आरोपों से इनकार करते हैं.

उनका दावा है कि पहले की किसी भी पाकिस्तनी सरकार ने चरमपंथी समूहों पर इतनी कार्रवाई नहीं की है.

उनके लिए हर चीज़ कश्मीर की समस्या के समाधान पर निर्भर करती है.

वो कहते हैं कि अगर भारत और पाकिस्तान इसका कोई हल ढूंढ सकते हैं, तो बाक़ी सारी चीज़ें आसानी से हल हो सकती हैं.

भारत और पाकिस्तान दोनों मुस्लिम बहुत कश्मीर के पूरे हिस्से पर दावा करते हैं लेकिन दोनों का नियंत्रण कुछ हिस्सों पर ही है.

दोनों पड़ोसियों के बीच दो युद्ध हो चुके हैं.

2003 में दोनों पक्ष नियंत्रण रेखा (एलओसी) पर युद्धविराम पर सहमत हुए थे, लेकिन अंदरूनी अशांति क़ायम रही.

भारत प्रशासित कश्मीर में रहने वाले बहुत से लोगों में भारतीय शासन को लेकर असंतोष है और दिल्ली लंबे समय से पाकिस्तान पर अलगाववादी चरमपंथियों को समर्थन देने का आरोप लगाती रही है.

बड़े पैमाने पर बेरोज़ग़ारी और सुरक्षा बलों की ओर मानवाधिकार उल्लंघन की शिकायतों ने भी आंतरिक तनावों को बढ़ाया है और विद्रोह को हवा दी है.

इस साल संबंधों में तनाव की क्या वजह है?
बीती फ़रवरी में भारत प्रशासित कश्मीर के पुलवामा में हुए आत्मघाती हमले में बीएसएफ़ के 40 सुरक्षाकर्मियों की मौत हो गई थी.

दावा किया गया है कि इसके पीछे पाकिस्तान में पनाह लेने वाले चरमपंथियों का हाथ है.

पिछले कई दशकों में ये अपनी तरह का सबसे घातक हमला था और भारत ने कहा कि इस हमले में पाकिस्तानी सरकार का हाथ है.

इसके जवाब में भारत ने हवाई हमला किया और दावा किया कि पाकिस्तान के इलाक़े में चरमपंथियों के ट्रेनिंग कैंप को निशाना बनाया गया.

इस कार्रवाई के दौरान पाकिस्तान ने भार के एक लड़ाकू विमान को पाकिस्तान प्रशासित कश्मीर में मार गिराया.

विमान का पॉयलट ज़िंदा पकड़ा गया, लेकिन उसे सुरक्षित भारत को लौटा दिया गया.

इमरान ख़ान ने इसे 'शांति का संदेश' कहा था.

उसके बाद से तनाव कुछ कम हुआ, लेकिन इस सप्ताह के शुरुआत में पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने भारत पर एक और सैन्य कार्रवाई करने की योजना बनाने का आरोप लगाया.

Tuesday, April 2, 2019

वो हरी सब्ज़ी जो 'जानलेवा' बन सकती है

ग़लत ढंग से पकाए जाने पर ये ज़हरीली हो सकती हैं लेकिन स्थानीय लोगों द्वारा प्रकृति से खाद्य पदार्थ लेने की चाहत में ये पत्तियां हाल ही में फिर से अपनी पैठ बना रही हैं.

उत्तरी कैरोलीना में गर्मियों के दिन से ठीक पहले बसंत ऋतु विदाई की तैयारी कर रही थी. अपने वयस्क जीवन में मैं पहली बार एक मुकम्मल बगीचा बनाने की तैयारी कर रहा था.

कम्पोस्ट डालने के लिए जब मैं निशान लगा रहा था तो मेरे बगल में मशीनी हल की आवाज़ सुनाई दी. लाल चिकनी मिट्टी को उलट-पुलट करती एक ओर रखकर छोटे कंकड़ों को बाहर फेंकने वाली यह मशीन अपना काम बख़ूबी करते हुए क्यारियां तैयार कर रही थी.

मशीन चलाने वाला व्यक्ति अपना काम समाप्त करने के बाद लंबी सांस भरते हुए बगल में आ खड़ा हुआ था.

मेरी ज़मीन की सीमा पर लगी बाड़ की ओर इशारा करते हुए उसने बड़ी बेपरवाही से कहा, "वहां काफ़ी पोक सलाद उगी हुई है."

मेरी नज़रों ने उसके इशारे का पीछा करते हुए मुआयना किया. जो मैंने देखा उसने मुझे अपने बचपन में धकेल दिया. पोक सलाद- ये दो शब्द मेरी यादों में मां और चाचियों को ले आया जो गांव-गिरांव से गुजरते हुए जब भी कभी पोकवीड या पोक सलाद नामक इन पौधों की हरियाली देखती थीं और रुक कर बड़ी सफाई से पौधे के तने से पत्तियां तोड़ लेती थीं.

यादों में रसोई से उठने वाली परदादी द्वारा पकाई जा रही उस व्यंजन की खुशबू भी तैर गई जो इन पत्तियों के साथ-साथ बेकन ग्रीज़ यानी सुअर की चर्बी को मिलाकर तैयार होता था.

समूचे अमरीका में प्रचुर मात्रा में उगने वाला यह जंगली हरा पौधा दक्षिणी न्यूयॉर्क राज्य से उत्तर पूर्वी मिसीसिपी तथा बाकी के दक्षिणी हिस्से में अप्पालेचियाई पहाड़ों के साथ-साथ उगता है. इन पत्तियों से बनने वाले हरे व्यंजन को पोक सैलेट के नाम से लोकप्रियता मिली है.

लूज़ियाना के टोनी जे व्हाइट के 1969 के हिट गाने पोक सलाद ऐनी से इसकी वर्तनी यानी स्पेलिंग पोक सलाद बन गई. 25 वर्ष पहले उत्तरी कैरोलीना के ठीक बीच में बसे एक ग्रामीण शहर (कम से कम जब तक मैं वहां रहता था तब तक का उसका रूप), सैनफोर्ड के अपने शांत घर से विदा लेने के बाद से मैंने ये दो शब्द सुने नहीं थे.

इस दौरान मेरा पिछला एक दशक पोलेरैडो में एक डिज़िटल यायावर के रूप में बीता था और पिछले आठ महीने की अल्पावधि मैंने मैक्सिको में बिताई थी.

मैं अभी-अभी उत्तरी कैरोलीना लौटा था. अपने पास अपनी ज़मीन थी तो मैं अपना भोजन खुद उगाने का निश्चय कर चुका था. बाढ़ के पास लगे इन पत्तेदार पौधों को देखकर अचानक ख्याल आया : क्या लोग अब भी पोक सैलेट खाते हैं?

संक्षेप में कहें तो उत्तर हां और ना दोनों ही है. दक्षिण में रहने वाले पुराने वाशिंदों से यदि आप पूछें तो बहुत सारे लोगों को पोक सैलेट खाने की याद अब भी है, या वो ऐसे किसी को जानते हैं जो इसे खाता था.

लेकिन यदि युवा पीढ़ी की बात करें तो दर्जनों लोगों से पूछने के बाद भी 40 से कम उम्र का मुझे एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं मिला जो इसका नाम भी जानता हो.

अमरीकियों की प्लेट से यह क्यों गायब हो गया और अब यह भोजन में फिर से अपना स्थान कैसे बना रहा है यह समझने के लिए हमने इस पौधे के इतिहास पर नज़र डालनी होगी.

अप्पालेचिया में पोकवीड कई पीढ़ियों तक लोगों का मुख्य भोजन रहा था. पश्चिमी वर्जीनिया के लॉस्ट क्रीक फार्म में शैफ और किसान माइक कोस्टेलो बताते हैं, "यह एक ऐसा पदार्थ था जो आप तब तक खाते थे जब आप गरीब थे. अब ऐसी बात नहीं रही." जंगली पौधों को ढूंढकर उनका व्यंजन बनाना लोगों की बढ़ती सुदृढ़ आर्थिक स्थित के साथ ही कम होता चला गया.

कोस्टेलो का कहना है, "पोक सैलेट जैसे व्यंजनों से सम्बद्ध बातें अधिकांशतः शर्म, गरीबी या हताशा भरी हैं, लेकिन मेरे लिए तो कुल मिलाकर मामला बुद्धिमानी और संसाधनों के प्रयोग का है. और इन बातों पर लोग गर्व कर सकते हैं."

यदि आप दक्षिण पूर्वी अमरीका में रहते हैं तो कुदरती तौर पर आपने पर्याप्त मात्रा में इस पौधे को उगते हुए देखा हो सकता है लेकिन ज़रूरी नहीं कि आप इसका नाम जानते हों. साल भर उगने वाला यह सख्तजान पौधा 10 फीट ऊंचा हो सकता है और लगभग कहीं भी फल-फूल सकता है.

एक बार पूर्णावस्था प्राप्त करने पर इसके पत्ते काफी निखरकर और बैंगनी रंग में दिखाई देते हैं जिन पर गहरे बैंगनी या काले फल लगे हो सकते हैं.

प्रकृति से चुने जाने वाले अन्य खाद्य पदार्थों की तरह पोकवीड के साथ भी एक समस्या है : यदि इसे ढंग से न तैयार किया जाए तो यह ज़हरीला हो सकता है.

केन्टकी के हार्लान में वार्षिक पोक सैलेट फेस्टिबल की मेज़बानी करने वाले सिटी ऑफ हार्लान टूरिस्ट एंड कन्वेंशन कमीशन के कार्यकारी निदेशक ब्रेंडन पेनिंगटन कहते हैं, "वर्षों पहले अप्पालेचिया में कुदरत पर आश्रित रहना बहुत अहम था और हमारे बहुत सारे बुजुर्ग अब भी यह जानते हैं कि आप कुदरत से लेकर क्या खा सकते हैं और क्या नहीं. लेकिन बड़े पैमाने पर होने वाली कृषि और उपलब्ध भोजन के चलते वह कला अब कहीं खो गई है."

पोक पौधे के फलों को स्याही से लेकर लिपिस्टिक तक लगभग सभी चीजों के लिए प्रयोग किया जाता रहा है (लिपिस्टिक के बारे में डॉली पार्टन ने अपनी प्रेरणादायी पुस्तक ड्रीम मोर : सेलिब्रेट द ड्रीमर इन यू में भी जिक्र किया है), लेकिन इन्हें कभी खाना नहीं है- न तो जड़ों को, न तने को, न बीज को और न ही कच्ची पत्तियों को.

हालांकि, आधुनिक युग में पोक सैलेट खाने से किसी की मृत्यु हुई हो, ऐसा मामला तो सामने नहीं आया है लेकिन इस पौधे के विभिन्न हिस्से ज़हरीले होते हैं और अक्सर इनके फल खाने से बच्चों को बीमार पड़ते देखा गया है.

जंगली अंगूर की तरह दिखने वाले इन फलों को खाने से भीषण पेट दर्द, बढ़ी हुई हृदयगति, उल्टी, दस्त तथा सांस लेने में दिक्कत भी हो सकती है.