ग्वालियर में संगीत के 'सेनिया बंगश' घराने की छठी पीढ़ी में जन्म लेने वाले अमजद अली ख़ान को संगीत विरासत में मिला.
महज़ 12 साल की उम्र में उन्होंने एकल सरोद-वादन का पहला सार्वजनिक प्रदर्शन किया था. एक छोटे से बालक की सरोद पर अनूठी लयकारी सुन कर दिग्गज संगीतज्ञ दंग रह गए.
बीबीसी की इंदु पांडेय से ख़ास बातचीत में सरोद वादक अमजद अली ख़ान ने अपनी ज़िंदगी के बड़े ही दिलचस्प किस्से सुनाए.
अमजद अली ख़ान ने अपने पिता से ही सरोद वादन में परंपरागत तरीके से तकनीकी दक्षता हासिल की और अब एक बार फिर वो अपने दोनों बेटों अमान अली बंगश और अयान अली बंगश के साथ लंदन के रॉयल फेस्टिवल हॉल में प्रोग्राम करेंगे.
अपने बीते वक़्त के बारे में याद करते हुए अमजद अली ख़ान ने बताया, '' जिन दिनों भारत के प्राइम मिनिस्टर पी. वी. नरसिम्हा राव थे, उन दिनों प्रिंसेज़ डायना और प्रिंस चार्ल्स आये थे. प्रधानमंत्री ने मुझे भी डिनर के लिए बुलाया. मुझे पता नहीं था कि बहुत ही ख़ास लोगो को बुलाया गया है, मैं एक पुराना बुज़ुर्गों वाला शॉल लेके निकल गया.
पहुँचने पर मुझे अंदाज़ा हुआ कि डिनर सिर्फ़ 20 लोगों के लिए था, डॉ मनमोहन सिंह उस वक़्त फाइनेंस मिनिस्टर थे. डिनर ओपन एरिया में था और काफी ठंड हो गयी थी. अचानक वहां बैठे लोग इधर उधर देखने लगे, मैंने पूछा कि क्या खोज रहे हैं सब? पता लगा कि डायना को ठंड लग रही थी, पहले तो मैं हिचकिचाया कि मैं अपना पुराना शॉल दूँ या नहीं? पर मुझसे उनकी तकलीफ नहीं देखी गयी तो मैंने अपना शॉल उन्हें पहना दिया. डायना ने मुझे थैंक यू कहा और पुरे वक़्त उन्होंने उसे ओढ़े रखा''.
लंदन में आयोजित होने वाले लाइव शो के बारे में अमजद अली ख़ान ने बताया कि रॉयल फेस्टिवल हॉल में परफॉर्म करना हर किसी का सपना होता है और वो बेहद खुशनसीब हैं.
अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने अभी भी ईरान से तेल ख़रीद रहे देशों के लिए प्रतिबंधों से रियायतें ख़त्म करने का फ़ैसला लिया है.
व्हाइट हाउस का कहना है कि चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और तुर्की को दी गई छूट मई में समाप्त हो जाएगी.
इसके बाद इन देशों पर भी अमरीका के प्रतिबंध लागू हो जाएंगे.
अमरीका ने ये फ़ैसला ईरान के तेल निर्यात को शून्य पर लाने के उद्देश्य से किया है.
इसका मक़सद ईरान की सरकार के आय के मुख्य स्रोत को समाप्त करना है.
ईरान का कहना है कि प्रतिबंध अवैध हैं और उसके लिए छूट के कोई मायने नहीं है.
क्यों आई यह नौबत
बीते साल ट्रंप ने ईरान और छह पश्चिमी देशों के बीच हुए ऐतिहासिक परमाणु समझौते से अमरीका को अलग कर लिया था.
इसके बाद उन्होंने ईरान पर फिर से आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे ताकि उसे नए समझौते के लिए विवश किया जा सके.
अंतरराष्ट्रीय शक्तियों के साथ हुए परमाणु समझौते के तहत आर्थिक प्रतिबंधों से छूट के बदले ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों को जांच की अनुमति देने के लिए तैयार हुआ था.
ओबामा के शासनकाल में हुए इस समझौते को ट्रंप ने अमरीका के लिए घाटे का सौदा बताया था.
ट्रंप प्रशासन को उम्मीद है कि वो ईरान सरकार को नया समझौता करने के लिए मजबूर कर लेंगे और इसके दायरे में सिर्फ़ ईरान का परमाणु कार्यक्रम ही नहीं बल्कि बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम भी होगा.
अमरीका का ये भी कहना है कि इससे मध्य पूर्व में ईरान का "अशिष्ट व्यवहार" भी नियंत्रित होगा.
अमरीकी प्रतिबंधों का ईरान की अर्थव्यवस्था पर व्यापक असर हुआ है. ईरान की मुद्रा इस समय रिकॉर्ड निचले स्तर पर है.
सालाना महंगई दर चार गुणा तक बढ़ गई है, विदेशी निवेशक जा रहे हैं और परेशान लोगों ने सरकार के ख़िलाफ़ प्रदर्शन तक किए हैं.
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